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mahabharat 12.316.20: जैसे बादल से गिरती हुई वर्षा की बूँदों के प्रभाव से पर्वत विचलित नहीं होता, वैसे ही अनेक प्रकार के विक्षेप भी योगी को विचलित नहीं कर सकते। यही योग में तत्पर पुरुष की पहचान है॥ 20॥   |   mahabharat अध्याय 12.316: योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 316: योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.316.20 
पाषाण इव मेघोत्थैर्यथा बिन्दुभिराहत:।
नालं चालयितुं शक्यस्तथा युक्तस्य लक्षणम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जैसे बादल से गिरती हुई वर्षा की बूँदों के प्रभाव से पर्वत विचलित नहीं होता, वैसे ही अनेक प्रकार के विक्षेप भी योगी को विचलित नहीं कर सकते। यही योग में तत्पर पुरुष की पहचान है॥ 20॥
 
Just as a mountain does not become shaken by the impact of the raindrops falling from a cloud, similarly many types of distractions cannot disturb a Yogi. This is the identity of a person engaged in Yoga.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)