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mahabharat 12.316.13-17: मिथिलानरेश! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - ये इन्द्रियों के पाँच दोष हैं। इन दोषों को दूर करो। फिर लय और विक्षेपों को शांत करके समस्त इन्द्रियों को मन में स्थिर करो। नरेश्वर! तत्पश्चात मन को अहंकार में, अहंकार को बुद्धि में और बुद्धि को प्रकृति में स्थापित करो। इस प्रकार योगीजन सब कुछ जानकर उस परमात्मा का ही ध्यान करते हैं, जो कषायों से रहित, शुद्ध, नित्य, सनातन, शुद्ध, छिद्ररहित, भ्रष्ट, अन्तर्यामी, अभेद्य, अमर, अविनाशी, सबके अधिपति और सनातन ब्रह्म हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.316: योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 316: योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति  »  श्लोक 13-17
 
 
श्लोक  12.316.13-17 
पञ्चानामिन्द्रियाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा।
शब्दं रूपं तथा स्पर्शं रसं गन्धं तथैव च॥ १३॥
प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल।
इन्द्रियग्राममखिलं मनस्यभिनिवेश्य ह॥ १४॥
मनस्तथैवाहंकारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप।
अहंकारं तथा बुद्धौ बुद्धिं च प्रकृतावपि॥ १५॥
एवं हि परिसंख्याय ततो ध्यायन्ति केवलम्।
विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम्॥ १६॥
तस्थुषं पुरुषं नित्यमभेद्यमजरामरम्।
शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं ब्रह्म चाव्ययम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मिथिलानरेश! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - ये इन्द्रियों के पाँच दोष हैं। इन दोषों को दूर करो। फिर लय और विक्षेपों को शांत करके समस्त इन्द्रियों को मन में स्थिर करो। नरेश्वर! तत्पश्चात मन को अहंकार में, अहंकार को बुद्धि में और बुद्धि को प्रकृति में स्थापित करो। इस प्रकार योगीजन सब कुछ जानकर उस परमात्मा का ही ध्यान करते हैं, जो कषायों से रहित, शुद्ध, नित्य, सनातन, शुद्ध, छिद्ररहित, भ्रष्ट, अन्तर्यामी, अभेद्य, अमर, अविनाशी, सबके अधिपति और सनातन ब्रह्म हैं।
 
King of Mithilana! Sound, touch, form, taste and smell – these are the five defects of the senses. Remove these defects. Then calm down the rhythm and distractions and stabilize all the senses in the mind. Nareshwar! After that, establish the mind in the ego, the ego in the intellect and the intellect in nature. In this way, yogis, having mastered everything, meditate only on that Supreme Soul, who is devoid of passions, pure, eternal, eternal, pure, without holes, corrupt, inner, impermeable, immortal, immortal, unchangeable, the ruler of all and the eternal Brahma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)