श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 315: प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.315.7 
कर्तृत्वाच्चापि सर्गाणां सर्गधर्मा तथोच्यते।
कर्तृत्वाच्चापि योगानां योगधर्मा तथोच्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि वह स्वयं को जगत् का रचयिता मानता है, इसलिए उसे सर्गधर्मा कहते हैं और क्योंकि वह स्वयं को योग का रचयिता मानता है, इसलिए उसे योगधर्मा कहते हैं ॥7॥
 
Because he considers himself the creator of the universe, he is called Sargadharma and because he considers himself the creator of Yoga, he is called Yogadharma. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)