श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 315: प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.315.3 
गुणस्वभावस्त्वव्यक्तो गुणान् नैवातिवर्तते।
उपयुंक्ते च तानेव स चैवाज्ञ: स्वभावत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अव्यक्त प्रकृति स्वभावतः गुणों से युक्त है। वह गुणों का कभी उल्लंघन नहीं कर सकती। वह उन्हीं गुणों का ही उपयोग करती है और स्वभावतः ज्ञान से रहित है॥3॥
 
The unmanifested nature is inherently endowed with qualities. It can never violate the qualities. It uses only those qualities and is inherently devoid of knowledge.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)