श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 315: प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.315.20 
ये त्वन्ये तत्त्वकुशलास्तेषामेतन्निदर्शनम्।
अत: परं प्रवक्ष्यामि योगानामनुदर्शनम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
दार्शनिक विचार में निपुण अन्य विद्वानों का भी यही मत है। इसके बाद मैं योगियों के शास्त्रों का वर्णन करूँगा।
 
Other scholars who are adept in philosophical thought also have the same opinion. After this I will describe the scriptures of the Yogis.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकके संवादमें तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)