श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 315: प्रकृति-पुरुषका विवेक और उसका फल  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.315.11 
अव्यक्तैकत्वमित्याहुर्नानात्वं पुरुषे तथा।
सर्वभूतदयावन्त: केवलं ज्ञानमास्थिता॥ ११॥
 
 
अनुवाद
कुछ विद्वान् सांख्यवेत्ता, जो सब प्राणियों पर दया करते हैं और केवल ज्ञान का ही आश्रय लेते हैं, प्रकृति को एक और पुरुष को अनेक मानते हैं ॥11॥
 
Some learned Sankhya scholars, who have compassion on all living beings and rely only on knowledge, consider Prakriti (nature) to be one and Purusha (persons) to be many. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)