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mahabharat 12.314.2-3h: यह तेजस्वी प्रकृति अपने प्रभाव से जीवों को सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों रूपों में प्रकट करती है।   |   mahabharat अध्याय 12.314: सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 314: सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न  »  श्लोक 2-3h
 
 
श्लोक  12.314.2-3h 
अव्यक्तरूपो भगवान् शतधा च सहस्रधा।
शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा॥ २॥
कोटिशश्च करोत्येष प्रत्यगात्मानमात्मना।
 
 
अनुवाद
यह तेजस्वी प्रकृति अपने प्रभाव से जीवों को सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों रूपों में प्रकट करती है।
 
This glorious Nature, by its own influence, makes the living beings appear in hundreds, thousands, lakhs and crores of forms. 2 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)