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mahabharat 12.313.17-20: धैर्य, आनन्द, प्रेम, श्रेष्ठता, प्रकाश (ज्ञानशक्ति), प्रसन्नता, शुद्धि, स्वास्थ्य, संतोष, श्रद्धा, अकार्पण्य (विनम्रता का अभाव), असम्रम्भ (क्रोध का अभाव), क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, ऋणमुक्ति, मृदुता, लज्जा, चंचलता, शौच, सरलता, सदाचार, अविनाशीता, हृदय में भ्रम का न होना, अच्छे-बुरे का भेद न होना। भलाई करना, दान द्वारा धैर्य धारण करना, किसी वस्तु की इच्छा न करना, दान और सभी प्राणियों पर दया करना - ये सब सत्त्वगुण कहे गए हैं। 17-20॥   |   mahabharat अध्याय 12.313: अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके लक्षण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 313: अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके लक्षण  »  श्लोक 17-20
 
 
श्लोक  12.313.17-20 
सत्त्वमानन्द उद्रेक: प्रीति: प्राकाश्यमेव च।
सुखं शुद्धित्वमारोग्यं संतोष: श्रद्दधानता॥ १७॥
अकार्पण्यमसंरम्भ: क्षमा धृतिरहिंसता।
समता सत्यमानृण्यं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ १८॥
शौचमार्जवमाचारमलौल्यं हृद्यसम्भ्रम:।
इष्टानिष्टवियोगानां कृतानामविकत्थना॥ १९॥
दानेन चात्मग्रहणमस्पृहत्वं परार्थता।
सर्वभूतदया चैव सत्त्वस्यैते गुणा: स्मृता:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
धैर्य, आनन्द, प्रेम, श्रेष्ठता, प्रकाश (ज्ञानशक्ति), प्रसन्नता, शुद्धि, स्वास्थ्य, संतोष, श्रद्धा, अकार्पण्य (विनम्रता का अभाव), असम्रम्भ (क्रोध का अभाव), क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, ऋणमुक्ति, मृदुता, लज्जा, चंचलता, शौच, सरलता, सदाचार, अविनाशीता, हृदय में भ्रम का न होना, अच्छे-बुरे का भेद न होना। भलाई करना, दान द्वारा धैर्य धारण करना, किसी वस्तु की इच्छा न करना, दान और सभी प्राणियों पर दया करना - ये सब सत्त्वगुण कहे गए हैं। 17-20॥
 
Patience, joy, love, excellence, light (power of knowledge), happiness, purification, health, contentment, faith, akarpanya (absence of humility), asamrambha (absence of anger), forgiveness, perseverance, non-violence, equality, truth, being free from debt, softness, shyness, restlessness, defecation, simplicity, virtue, indestructibility, no confusion in the heart, no separation between good and evil. Doing good, exercising patience through charity, not desiring anything, charity and kindness towards all living beings - all these have been described as virtues related to Sattva. 17-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)