vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 313: अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके लक्षण
»
श्लोक 15
श्लोक
12.313.15
प्रकृतिर्गुणान् विकुरुते स्वच्छन्देनात्मकाम्यया।
क्रीडार्थे तु महाराज शतशोऽथ सहस्रश:॥ १५॥
अनुवाद
महाराज! प्रकृति स्वतन्त्रतापूर्वक क्रीड़ा करने के लिए अपनी इच्छा से सैकड़ों-हजारों गुणों की सृष्टि करती है॥15॥
Maharaj! Nature, in order to play freely, creates hundreds and thousands of qualities by her own will. ॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×