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mahabharat 12.311.1: याज्ञवल्क्य कहते हैं, "हे पुरुषश्रेष्ठ! अब मुझसे अव्यक्त की अवधि के विषय में सुनो। दस हजार कल्प (महायुग) अव्यक्त का एक दिन कहा गया है।"   |   mahabharat अध्याय 12.311: अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 311: अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.311.1 
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्य नरश्रेष्ठ कालसंख्यां निबोध मे।
पञ्चकल्पसहस्राणि द्विगुणान्यहरुच्यते॥ १॥
 
 
अनुवाद
याज्ञवल्क्य कहते हैं, "हे पुरुषश्रेष्ठ! अब मुझसे अव्यक्त की अवधि के विषय में सुनो। दस हजार कल्प (महायुग) अव्यक्त का एक दिन कहा गया है।"
 
Yagyavalkya says, "O best of men! Now listen to me about the duration of the unmanifested. Ten thousand kalpas (mahayugas) are said to be one day of the unmanifested."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)