श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 311: अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन  » 
 
 
अध्याय 311: अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन
 
श्लोक 1:  याज्ञवल्क्य कहते हैं, "हे पुरुषश्रेष्ठ! अब मुझसे अव्यक्त की अवधि के विषय में सुनो। दस हजार कल्प (महायुग) अव्यक्त का एक दिन कहा गया है।"
 
श्लोक 2:  नरेश्वर ! उनकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी है। ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही सर्वप्रथम समस्त प्राणियों के पालन के लिए औषधियों (विभिन्न प्रकार के अन्न) का निर्माण करते हैं॥2॥
 
श्लोक 3:  हमने सुना है कि औषधियों की रचना के पश्चात् भगवान ने ब्रह्माजी को उत्पन्न किया था, जो स्वर्ण अण्डे के अन्दर से प्रकट हुए थे। वे ही समस्त भूतों के मूल हैं॥3॥
 
श्लोक 4:  वे महामुनि प्रजापति ब्रह्मा उस स्वर्ण अण्डे के अन्दर एक वर्ष तक रहे और फिर उससे बाहर निकल आए। फिर वे सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश और ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग) की रचना के विषय में सोचने लगे॥4॥
 
श्लोक 5:  महाराज! शक्तिशाली ब्रह्मा ने उस अण्डे के दो टुकड़े करके स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का स्थान बनाया। इसका उल्लेख वेदों में मिलता है।
 
श्लोक 6:  वेद और वेदांगों के विशेषज्ञ विद्वान ब्रह्मा के समय की अवधि पर विचार करते हुए कहते हैं कि दस हजार कल्पों में से एक-चौथाई घटाने पर जो शेष बचता है, वही ब्रह्मा के एक दिन का मान है, अर्थात् साढ़े सात हजार कल्पों का एक दिन होता है।
 
श्लोक 7:  अध्यात्म-सिद्धान्तों का चिंतन करने वाले विद्वान कहते हैं कि ब्रह्माजी की रात्रि भी उतनी ही लम्बी है। महर्षि ब्रह्मा अहंकार नामक दिव्य भूत की रचना करते हैं॥7॥
 
श्लोक 8:  श्रेष्ठ! प्राचीन काल में स्थूल शरीर की उत्पत्ति से पूर्व महर्षि ब्रह्मा ने चार अन्य पुत्रों (जिनके नाम हैं - बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त) की रचना की। वे चारों पुत्र 'पितरों के पितर' अर्थात् पंचमहाभूतों के पिता माने गए हैं। 8॥
 
श्लोक 9:  नरश्रेष्ठ! हमने सुना है कि देवता (श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ) पितरों (पंचमहाभूतों) के पुत्र हैं, अर्थात् समस्त इन्द्रियाँ पंचमहाभूतों से उत्पन्न हुई हैं और वे सम्पूर्ण चराचर जगत के आश्रय में स्थित हैं, ऐसा हमने सुना है।
 
श्लोक 10:  सृष्टिकर्ता के उच्च पद में स्थित अहंकार पाँच प्रकार के तत्त्वों का निर्माण करता है - आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ॥10॥
 
श्लोक 11:  इस तीसरी भौतिक सृष्टि के रचयिता अहंकार की रात्रि पाँच हजार कल्पों की है। उसका दिन भी उतना ही लम्बा बताया गया है॥11॥
 
श्लोक 12:  राजेन्द्र! आकाश आदि पंचमहाभूतों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध क्रमशः विशेष गुण हैं।
 
श्लोक 13-14:  पृथ्वीनाथ! इन सुन्दर वचनों तथा अन्य विषयों से, जो सदैव प्रवाह रूप में विद्यमान रहते हैं, प्रभावित होकर सम्पूर्ण प्राणी प्रतिदिन कभी एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, कभी परस्पर कल्याण करने को तत्पर रहते हैं, कभी एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं, कभी एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हैं और कभी एक-दूसरे पर आक्रमण भी करते हैं॥13-14॥
 
श्लोक 15-16h:  ऐसे विषय-भोगी प्राणी स्वर्गलोक में प्रवेश करते हैं और इस लोक में विचरण करते रहते हैं। इन विषयों आदि का एक दिन तीन हजार कल्पों का कहा गया है। नरेश्वर! इनकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी है। मन में दिन और रात्रि का परिमाण भी एक ही है। 15 1/2॥
 
श्लोक 16-17:  राजेन्द्र! मन इन्द्रियों द्वारा संचालित होकर समस्त विषयों की ओर गति करता है। इन्द्रियाँ उन विषयों को नहीं देखतीं, मन ही है जो उन्हें निरन्तर देखता रहता है। नेत्र मन की सहायता से ही रूप को देखते हैं, अपनी शक्ति से नहीं॥16-17॥
 
श्लोक 18:  जब मन चंचल होता है, तब आँखें देखती हुई भी नहीं देख पातीं। लोग भूलवश कहते हैं कि सभी इन्द्रियाँ विषयों का अनुभव करती हैं॥18॥
 
श्लोक 19:  परन्तु इन्द्रियाँ कुछ नहीं देखतीं, केवल मन ही देखता है। राजन! जब मन विषयों से ऊपर हो जाता है, तब इन्द्रियाँ भी विषयों से मुक्त हो जाती हैं। 19॥
 
श्लोक 20:  परन्तु जब इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं, तब मन में कोई अतिवृद्धि नहीं होती। इस प्रकार यह निश्चय कर लेना चाहिए कि मन ही सब इन्द्रियों में श्रेष्ठ है। 20॥
 
श्लोक 21:  मन को समस्त इन्द्रियों का स्वामी कहा गया है। हे राजन! संसार के समस्त प्राणी इसी मनके का आश्रय लेते हैं। 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)