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mahabharat 12.310.21: कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और पाँचवाँ नासिका - यह छठा स्कन्ध कहा गया है। यह अत्यन्त मननशील स्कन्ध माना गया है॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.310: याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.310.21 
श्रोत्रं त्वक् चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम्।
सर्गं तु षष्ठमित्याहुर्बहुचिन्तात्मकं स्मृतम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और पाँचवाँ नासिका - यह छठा स्कन्ध कहा गया है। यह अत्यन्त मननशील स्कन्ध माना गया है॥ 21॥
 
Ear, skin, eyes, tongue and the fifth nose – this is said to be the sixth canto. This is considered to be a highly contemplative canto.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)