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mahabharat 12.310.18: मन अहंकार से उत्पन्न हुआ है, जो पंचभूत और शब्द आदि गुणों के रूप में है। इसे तीसरा एवं अहंकारमय स्कन्ध कहा गया है ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.310: याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.310.18 
अहङ्काराच्च सम्भूतं मनो भूतगुणात्मकम्।
तृतीय: सर्ग इत्येष आहङ्कारिक उच्यते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
मन अहंकार से उत्पन्न हुआ है, जो पंचभूत और शब्द आदि गुणों के रूप में है। इसे तीसरा एवं अहंकारमय स्कन्ध कहा गया है ॥18॥
 
Mind has arisen from ego, which is in the form of qualities like Panchabhuta and Shabda etc. This is called the third and egoistic canto. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)