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mahabharat 12.310.12-13: ये आठ प्रकृतियाँ कही गई हैं। अब मुझसे कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, पाँचवाँ नासिका, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, वाणी, हाथ, पैर, लिंग और गुदा- इन दोषों का भी वर्णन सुनो।॥12-13॥   |   mahabharat अध्याय 12.310: याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 310: याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  12.310.12-13 
एता: प्रकृतयस्त्वष्टौ विकारानपि मे शृणु।
श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम्॥ १२॥
शब्द: स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।
वाक् च हस्तौ च पादौ च पायुर्मेढ्रं तथैव च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
ये आठ प्रकृतियाँ कही गई हैं। अब मुझसे कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, पाँचवाँ नासिका, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, वाणी, हाथ, पैर, लिंग और गुदा- इन दोषों का भी वर्णन सुनो।॥12-13॥
 
These are said to be the eight natures. Now listen to me describing the defects as well- the ear, the skin, the eye, the tongue, the fifth nostril, sound, touch, form, taste, smell, speech, hands, feet, the penis and the anus.॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)