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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 31: सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.31.5 
तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा।
सर्वकामै: सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ राजा ने हम दोनों का शास्त्रोक्त विधि से पूजन किया और हमें मनोवांछित वस्तुएँ प्रदान कीं। हम दोनों उसके महल में रहने लगे।
 
There the king worshipped us both according to the scriptures and arranged for us to get all the things we desired. We both started living in his palace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)