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mahabharat 12.309.16: एक ही कर्म देश, काल, व्यक्ति और विशिष्ट कर्म के आधार पर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए धर्म या अधर्म बन जाता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.309: जनकवंशी वसुमान‍्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 309: जनकवंशी वसुमान‍्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.309.16 
स एव धर्म: सोऽधर्मस्तं तं प्रति नरं भवेत्।
पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च॥ १६॥
 
 
अनुवाद
एक ही कर्म देश, काल, व्यक्ति और विशिष्ट कर्म के आधार पर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए धर्म या अधर्म बन जाता है ॥16॥
 
The same action becomes dharma or adharma for different persons depending on the place, time, person and the specific action. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)