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mahabharat 12.309.10: जो मनुष्य वन में रहकर भी ग्राम्य सुख भोगता है, उसे ग्रामवासी समझना चाहिए; और जो मनुष्य ग्राम में रहकर भी वनवासी ऋषि के समान आचरण करने में सुख पाता है, उसे वनवासियों में ही गिना जाना चाहिए॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.309: जनकवंशी वसुमान‍्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 309: जनकवंशी वसुमान‍्को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.309.10 
वने ग्राम्यसुखाचारो यथा ग्राम्यस्तथैव स:।
ग्रामे वनसुखाचारो यथा वनचरस्तथा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य वन में रहकर भी ग्राम्य सुख भोगता है, उसे ग्रामवासी समझना चाहिए; और जो मनुष्य ग्राम में रहकर भी वनवासी ऋषि के समान आचरण करने में सुख पाता है, उसे वनवासियों में ही गिना जाना चाहिए॥10॥
 
A person who, despite living in the forest, is engaged in enjoying rural comforts should be considered a villager; and a person who, despite living in the village, finds happiness in behaving like a forest-dwelling sage should be counted among the forest-dwellers.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)