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mahabharat 12.308.50: भरतनन्दन! अज्ञान का सागर अव्यक्त, अथाह और भयानक कहा गया है। असंख्य प्राणी प्रतिदिन उसमें गोते लगाते रहते हैं। 50॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.308.50 
अज्ञानसागरो घोरो ह्यव्यक्तोऽगाध उच्यते।
अहन्यहनि मज्जन्ति यत्र भूतानि भारत॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! अज्ञान का सागर अव्यक्त, अथाह और भयानक कहा गया है। असंख्य प्राणी प्रतिदिन उसमें गोते लगाते रहते हैं। 50॥
 
Bharatnandan! The ocean of ignorance is said to be unexpressed, bottomless and terrible. Innumerable creatures keep diving in it every day. 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)