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mahabharat 12.308.44: तात! नरेश्वर! यह परम कल्याणकारी एवं उत्तम ज्ञान मैंने देवर्षि नारदजी के मुख से सुना था। जो आपसे भी विस्तारपूर्वक कहा गया है। 4 4॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.308.44 
एतन्नि:श्रेयसकरं ज्ञानं ते परमं मया।
कथितं तत्त्वतस्तात श्रुत्वा देवर्षितो नृप॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
तात! नरेश्वर! यह परम कल्याणकारी एवं उत्तम ज्ञान मैंने देवर्षि नारदजी के मुख से सुना था। जो आपसे भी विस्तारपूर्वक कहा गया है। 4 4॥
 
Tat! Nareshwar! I had heard this supremely beneficial and excellent knowledge from the mouth of Devarshi Naradji. Which has been told to you in detail also. 4 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)