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mahabharat 12.308.4: तत्! प्रकृति कभी नहीं जानती कि परमेश्वर सगुण है या निर्गुण (क्योंकि वह जड़ है), इसलिए सांख्य विद्वान् इस प्रकृति को अप्रतिबुद्ध (ज्ञान रहित) कहते हैं॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.308.4 
न त्वेव बुध्यतेऽव्यक्तं सगुणं तात निर्गुणम्।
कदाचित् त्वेव खल्वेतदाहुरप्रतिबुद्धकम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तत्! प्रकृति कभी नहीं जानती कि परमेश्वर सगुण है या निर्गुण (क्योंकि वह जड़ है), इसलिए सांख्य विद्वान् इस प्रकृति को अप्रतिबुद्ध (ज्ञान रहित) कहते हैं॥4॥
 
Tat! Nature never knows whether the Supreme God is sagun or nirgun (because it is inert), hence Sankhya scholars call this nature as Apratibuddha (without knowledge). 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)