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mahabharat 12.308.36: जो इन गुणों से सर्वथा रहित हो, उसे उपदेश नहीं देना चाहिए। इस ज्ञान को शुद्ध परब्रह्म कहा गया है। यदि यह ज्ञान गुणों से हीन व्यक्ति को दिया जाए, तो उसके लिए लाभदायक नहीं होगा और यदि यह ज्ञान अयोग्य व्यक्ति को दिया जाए, तो वक्ता के लिए भी लाभदायक नहीं होगा। 36.   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.308.36 
एतैर्गुणैर्हीनतमे न देय-
मेतत् परं ब्रह्म विशुद्धमाहु:।
न श्रेयसा योक्ष्यति तादृशे कृतं
धर्मप्रवक्तारमपात्रदानात्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जो इन गुणों से सर्वथा रहित हो, उसे उपदेश नहीं देना चाहिए। इस ज्ञान को शुद्ध परब्रह्म कहा गया है। यदि यह ज्ञान गुणों से हीन व्यक्ति को दिया जाए, तो उसके लिए लाभदायक नहीं होगा और यदि यह ज्ञान अयोग्य व्यक्ति को दिया जाए, तो वक्ता के लिए भी लाभदायक नहीं होगा। 36.
 
One who is very devoid of these virtues should not be preached to. This knowledge has been described as the pure Supreme Brahman. If this knowledge is given to a person lacking in virtues, it will not be beneficial for him and if preached to an unworthy person, it will not be beneficial to the speaker either. 36.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)