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mahabharat 12.308.27: पुरुषप्रवर! शुद्ध पुरुष की संगति से आत्मा शुद्ध धर्म से युक्त हो जाता है। ज्ञानी या बुद्धिमान पुरुष की संगति से वह बुद्धिमान हो जाता है। मुक्त पुरुष के मिलने पर उसमें मुक्त पुरुष के समान ही धर्म या गुण प्रकट हो जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.308.27 
विशुद्धधर्मा शुद्धेन बुद्धेन च स बुद्धिमान्।
विमुक्तधर्मा मुक्तेन समेत्य पुरुषर्षभ॥ २७॥
 
 
अनुवाद
पुरुषप्रवर! शुद्ध पुरुष की संगति से आत्मा शुद्ध धर्म से युक्त हो जाता है। ज्ञानी या बुद्धिमान पुरुष की संगति से वह बुद्धिमान हो जाता है। मुक्त पुरुष के मिलने पर उसमें मुक्त पुरुष के समान ही धर्म या गुण प्रकट हो जाते हैं।
 
Purushpravar! The soul becomes one with pure religion by associating with a pure person. He becomes intelligent by associating with a knowledgeable or intelligent person. On meeting a liberated person, the same religion or characteristics as that of a liberated person appear in him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)