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mahabharat 12.308.26: यह आत्मा केवल उपर्युक्त विधि से ही मुक्त हो सकती है, अन्यथा नहीं। ऐसा विद्वानों का मत है। किसी अन्य आत्मा से मिलने पर वह उसी धर्म की हो जाती है।   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.308.26 
सोऽयमेवं विमुच्येत नान्यथेति विनिश्चय:।
परेण परधर्मा च भवत्येष समेत्य वै॥ २६॥
 
 
अनुवाद
यह आत्मा केवल उपर्युक्त विधि से ही मुक्त हो सकती है, अन्यथा नहीं। ऐसा विद्वानों का मत है। किसी अन्य आत्मा से मिलने पर वह उसी धर्म की हो जाती है।
 
This soul can be liberated only in the above mentioned way and not otherwise. This is the opinion of learned people. On meeting another soul, it becomes of the same religion as that soul.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)