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mahabharat 12.308.25: विद्वान पुरुष कहते हैं कि इस शरीर में स्थित पच्चीसवें तत्व को, अर्थात् अन्तर्यामी पुरुष को, अव्यक्त महातत्त्ववादि के बंधन से मुक्त करना आवश्यक है ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.308.25 
पञ्चविंशतिकस्यास्य योऽयं देहेषु वर्तते।
एष मोक्षयितव्येति प्राहुरव्यक्तगोचरात्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष कहते हैं कि इस शरीर में स्थित पच्चीसवें तत्व को, अर्थात् अन्तर्यामी पुरुष को, अव्यक्त महातत्त्ववादि के बंधन से मुक्त करना आवश्यक है ॥25॥
 
The learned man says that it is necessary to free the twenty-fifth element, the inner man, who is present in this body, from the bondage of the unmanifested Mahatattvaadi. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)