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mahabharat 12.308.24: इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष की एकता और विविधता को समझना चाहिए। अव्यक्त प्रकृति और पुरुष के शाश्वत अंतर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य उसके बंधन से मुक्त हो जाता है। इसे मोक्ष कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.308.24 
एवमेवावगन्तव्यं नानात्वैकत्वमेतयो:।
एतद्धि मोक्ष इत्युक्तमव्यक्तज्ञानसंहितम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष की एकता और विविधता को समझना चाहिए। अव्यक्त प्रकृति और पुरुष के शाश्वत अंतर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य उसके बंधन से मुक्त हो जाता है। इसे मोक्ष कहते हैं।
 
Similarly, the unity and diversity of nature and man should be understood. By knowing the true knowledge of the eternal difference between the unmanifested nature and man, man becomes free from its bondage. This is called salvation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)