Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.308.20-21h: छब्बीसवाँ तत्त्व परमेश्वर अजन्मा, सर्वव्यापी और सर्वत्र दोषरहित है। जब जीवात्मा उसकी शरण में आकर उसके स्वरूप को जान लेता है, तब वह दिव्य ज्ञान के प्रभाव से स्वयं सर्वव्यापी हो जाता है और चौबीस तत्त्वों से युक्त प्रकृति को असार मानकर उसका परित्याग कर देता है। 20 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
छब्बीसवाँ तत्त्व परमेश्वर अजन्मा, सर्वव्यापी और सर्वत्र दोषरहित है। जब जीवात्मा उसकी शरण में आकर उसके स्वरूप को जान लेता है, तब वह दिव्य ज्ञान के प्रभाव से स्वयं सर्वव्यापी हो जाता है और चौबीस तत्त्वों से युक्त प्रकृति को असार मानकर उसका परित्याग कर देता है। 20 1/2॥
The twenty-sixth element, God, is unborn, omnipresent and free from any defect. When the soul takes refuge in Him and realizes His form, then due to the influence of divine knowledge, it itself becomes omnipresent and abandons the nature consisting of twenty-four elements, considering it as insubstantial. 20 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥