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mahabharat 12.308.19: मिथिलानरेश! जब तक जीवात्मा भौतिक वर्ग को अपना मानता है, तब तक वह उसी भौतिक वर्ग के साथ समता प्राप्त करता है। यद्यपि वह प्रकृति से असंबद्ध है, फिर भी प्रकृति के संपर्क के कारण वह प्रकृति में आसक्त हो जाता है। 19॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.308.19 
बुध्यमानोऽप्रबुद्धेन समतां याति मैथिल।
सङ्गधर्मा भवत्येष नि:सङ्गात्मा नराधिप॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मिथिलानरेश! जब तक जीवात्मा भौतिक वर्ग को अपना मानता है, तब तक वह उसी भौतिक वर्ग के साथ समता प्राप्त करता है। यद्यपि वह प्रकृति से असंबद्ध है, फिर भी प्रकृति के संपर्क के कारण वह प्रकृति में आसक्त हो जाता है। 19॥
 
King of Mithilana! As long as the living soul considers the material class as its own, it attains equality with that material class only. Even though he is unrelated to nature, yet due to contact with nature he becomes attached to nature. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)