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mahabharat 12.308.17: जीव छब्बीसवें तत्व ज्ञानरूपी भगवान के प्रकाश से ही इस भौतिक जगत को जानता है; किन्तु उसे जानकर भी, भगवान को न जानने के कारण वह अज्ञानी ही रहता है। यह अज्ञान ही जीव के नाना योनियों में बंधन का कारण कहा गया है। जैसा कि सांख्यशास्त्र और श्रुतियों में निर्देशित है। 17॥   |   mahabharat अध्याय 12.308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 308: क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.308.17 
षड्‍‍‍विंशेन प्रबुद्धेन बुध्यमानोऽप्यबुद्धिमान्।
एतन्नानात्वमित्युक्तं सांख्यश्रुतिनिदर्शनात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जीव छब्बीसवें तत्व ज्ञानरूपी भगवान के प्रकाश से ही इस भौतिक जगत को जानता है; किन्तु उसे जानकर भी, भगवान को न जानने के कारण वह अज्ञानी ही रहता है। यह अज्ञान ही जीव के नाना योनियों में बंधन का कारण कहा गया है। जैसा कि सांख्यशास्त्र और श्रुतियों में निर्देशित है। 17॥
 
The living being knows the material world only through the light of God in the form of the twenty-sixth element of knowledge; But even after knowing him, due to not knowing God, he remains ignorant. This ignorance is said to be the reason for the bondage of the living being in various forms. As guided by Sankhyashastra and Shrutis. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)