श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.307.47 
पञ्चविंशात् परं तत्त्वं पठॺते न नराधिप।
सांख्यानां तु परं तत्त्वं यथावदनुवर्णितम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! सांख्यशास्त्र के आचार्य पच्चीसवें तत्त्व से आगे किसी अन्य तत्त्व का वर्णन नहीं करते। इस प्रकार मैंने सांख्य के परम तत्त्व का वर्णन किया है। 47॥
 
Nareshwar! The teachers of Sankhyashastra do not describe any other element beyond the twenty-fifth element. This is how I have described the ultimate essence of Sankhya. 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)