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mahabharat 12.307.45: पृथ्वीनाथ! मैंने अपने शिष्यों के हित के लिए आपको सांख्य दर्शन का विस्तारपूर्वक उपदेश दिया है, जो उनके लिए ज्ञानवर्धक है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.307.45 
प्रबोधनकरं ज्ञानं सांख्यानामवनीपते।
विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! मैंने अपने शिष्यों के हित के लिए आपको सांख्य दर्शन का विस्तारपूर्वक उपदेश दिया है, जो उनके लिए ज्ञानवर्धक है ॥ 45॥
 
Prithvinath! For the benefit of my disciples, I have explained to you in detail the Sankhya philosophy which is enlightening for them. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)