एवं परमसम्बोधात् पञ्चविंशोऽनुबुद्धवान्।
अक्षरत्वं नियच्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामयम्॥ ४०॥
अनुवाद
इस प्रकार उत्तम विवेक द्वारा अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके चौबीस तत्त्वों से परे पच्चीसवाँ जीवात्मा क्षरभाव का त्याग करके निरामय अक्षरभाव को प्राप्त होता है ॥40॥
'In this way, after acquiring the knowledge of its pure nature through good discrimination, the twenty-fifth soul beyond the twenty-four elements, renouncing Ksharabhava (destructibility) attains Niramaya Aksharbhava. 40॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥