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mahabharat 12.307.40: इस प्रकार उत्तम विवेक द्वारा अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके चौबीस तत्त्वों से परे पच्चीसवाँ जीवात्मा क्षरभाव का त्याग करके निरामय अक्षरभाव को प्राप्त होता है ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.307.40 
एवं परमसम्बोधात् पञ्चविंशोऽनुबुद्धवान्।
अक्षरत्वं नियच्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामयम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उत्तम विवेक द्वारा अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके चौबीस तत्त्वों से परे पच्चीसवाँ जीवात्मा क्षरभाव का त्याग करके निरामय अक्षरभाव को प्राप्त होता है ॥40॥
 
'In this way, after acquiring the knowledge of its pure nature through good discrimination, the twenty-fifth soul beyond the twenty-four elements, renouncing Ksharabhava (destructibility) attains Niramaya Aksharbhava. 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)