श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.307.38 
ममत्वमनया नित्यमहंकारकृतात्मकम्।
अपेत्याहमिमां हित्वा संश्रयिष्ये निरामयम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
अब मैं इसे तथा इसके अहंकाररूपी मोह को त्यागकर इससे सर्वथा परे होकर सनातन भगवान् की शरण ग्रहण करूँगा ॥38॥
 
'Now, having abandoned it and its ego-like affection, I will completely transcend it and take refuge in the eternal God. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)