श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.307.37 
आत्मानं बहुधा कृत्वा येयं भूयो युनक्ति माम्।
इदानीमेष बुद्धोऽस्मि निर्ममो निरहंकृत:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
अब भी वह नाना प्रकार के रूप धारण करके मुझसे मिलने का प्रयत्न कर रही है; परन्तु अब मैं सावधान हो गया हूँ, इसलिए आसक्ति और अहंकार से मुक्त हो गया हूँ॥ 37॥
 
‘Even now she is trying to unite with me by assuming various forms; but now I have become cautious and therefore have become free from attachment and ego.॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)