श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.307.36 
योनीषु वर्तमानेन नष्टसंज्ञेन चेतसा।
न ममात्रानया कार्यमहंकारकृतात्मया॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
इसके साथ नाना योनियों में भटकने से मेरी चेतना नष्ट हो गई है। अब इस अहंकारमय स्वभाव से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है॥ 36॥
 
‘Due to wandering in various forms with it, I lost my consciousness. Now I have no use for this egoistic nature.॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)