श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.307.35 
प्राक् कृतेन ममत्वेन तासु तास्विह योनिषु।
निर्ममस्य ममत्वेन किं कृतं तासु तासु च॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
पहले जो आसक्ति मुझमें थी, उसी के कारण मुझे नाना योनियों में भटकना पड़ा। यद्यपि मैं आसक्ति से रहित हूँ, फिर भी इस स्वभावजन्य आसक्ति ने मुझे नाना योनियों में डालकर महान दुःख दिया है।
 
'Because of the attachment I had for it earlier, I had to wander in different species. Although I am devoid of attachment, yet this attachment born of nature has put me in different species and has caused me great misery.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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