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mahabharat 12.307.34: यद्यपि मैं पूर्णतया निराकार हूँ, अर्थात् मेरा कोई आकार नहीं है, तथापि प्रकृति के नाना रूपों में स्थित होने के कारण, आसक्ति से ग्रस्त होने के कारण मैं अशरीरी होते हुए भी देहधारी ही रहा॥ 34॥   |   mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.307.34 
ततोऽस्मि बहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान्।
अमूर्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षित:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं पूर्णतया निराकार हूँ, अर्थात् मेरा कोई आकार नहीं है, तथापि प्रकृति के नाना रूपों में स्थित होने के कारण, आसक्ति से ग्रस्त होने के कारण मैं अशरीरी होते हुए भी देहधारी ही रहा॥ 34॥
 
‘Although I am completely formless, that is, I have no form, yet being situated in the various forms of Nature, I remained embodied even though I am bodiless due to being overcome by attachment.॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)