श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.307.33 
न चायमपराधोऽस्या ह्यपराधो ह्ययं मम।
योऽहमत्राभवं सक्त: पराङ्मुखमुपस्थित:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
परंतु इसमें उसका कोई दोष नहीं है, सारा दोष मेरा ही है; कि मैं परमात्मा से विमुख होकर इसमें आसक्त हो गया॥ 33॥
 
‘But this is not his fault, the whole fault is mine; that I turned away from the Supreme Being and remained attached to this.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)