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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्गारका वर्णन
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श्लोक 31
श्लोक
12.307.31
समानयानया चेह सह वासमहं कथम्।
गच्छाम्यबुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे॥ ३१॥
अनुवाद
जो प्रकृति मुझसे एकाकार हो गई है, मेरे समान है, उसके साथ मैं मूर्खतापूर्वक कैसे संगति कर सकता हूँ? देखो, अब मैं स्थिर हो रहा हूँ।'
'How can I foolishly associate with this Prakriti which has become one with me and is equal to me? Look, I am becoming stable now.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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