श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.307.29 
योऽहमज्ञानसम्मोहादज्ञया सम्प्रवृत्तवान्।
ससङ्गयाहं नि:सङ्ग: स्थित: कालमिमं त्वहम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मैं जो आसक्ति से सर्वथा मुक्त हूँ, फिर भी अज्ञान और मोह के वश में होकर इतने समय तक इस जड़ आसक्ति स्वरूप को भोगता रहा ॥29॥
 
'I, who am completely free from attachment, yet under the influence of ignorance and fascination, continued to enjoy this inanimate nature of attachment for so long. 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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