श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.307.28 
तुल्यतामिह पश्यामि सदृशोऽहमनेन वै।
अयं हि विमलो व्यक्तमहमीदृशकस्तथा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इसमें मैं अपना स्वरूप देखता हूँ। मैं निश्चय ही ऐसा ही हूँ। यह भगवान् प्रत्यक्षतः अत्यन्त शुद्ध हैं और मैं भी ऐसा ही हूँ॥28॥
 
‘In this I see my likeness. I am definitely like this. This God is obviously very pure and so am I.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)