श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.307.27 
अयमत्र भवेद् बन्धुरनेन सह मे क्षमम्।
साम्यमेकत्वमायातो यादृशस्तादृशस्त्वहम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में, इस संसार में वे ही परमात्मा मेरे एकमात्र मित्र हैं। मैं उनसे मित्रता कर सकता हूँ। अतीत में मैं चाहे जैसा भी रहा हूँ, अब मैं उनकी समता और एकता को प्राप्त कर चुका हूँ। मैं वैसा ही हूँ जैसा वे हैं॥27॥
 
‘In reality, this Supreme Being is my only friend in this world. I can be friends with Him. No matter how I may have been in the past, now I have attained His equality and unity. I am as He is.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)