Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.307.24: जैसे मछली जल को ही अपना जीवन मानकर एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है, वैसे ही मैं भी आसक्ति के कारण एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकता रहता हूँ॥ 24॥ | mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्गारका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अहमेव हि सम्मोहादन्यमन्यं जनाज्जनम्।
मत्स्यो यथोदकज्ञानादनुवर्तितवानहम्॥ २४॥
अनुवाद
जैसे मछली जल को ही अपना जीवन मानकर एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है, वैसे ही मैं भी आसक्ति के कारण एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकता रहता हूँ॥ 24॥
‘Just as a fish goes from one body of water to another, considering water as the source of its life, so I, too, kept wandering from one body to another, due to attachment.॥ 24॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥