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mahabharat 12.307.23: (जब आत्मा को विवेक प्राप्त होता है, तब वह ऐसा सोचता है:) 'अहा! मैंने क्या किया? जैसे मछली अज्ञानवश जाल में फँस जाती है, वैसे ही मैं भी आज तक इस स्थूल शरीर का अनुसरण करता आया हूँ॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.307.23 
किं मया कृतमेतावद् योऽहं कालमिमं जनम्।
मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवानिह॥ २३॥
 
 
अनुवाद
(जब आत्मा को विवेक प्राप्त होता है, तब वह ऐसा सोचता है:) 'अहा! मैंने क्या किया? जैसे मछली अज्ञानवश जाल में फँस जाती है, वैसे ही मैं भी आज तक इस स्थूल शरीर का अनुसरण करता आया हूँ॥ 23॥
 
(When the soul gets discernment, it thinks thus:) 'Oh! What have I done? Just as a fish, out of ignorance, goes and gets caught in the net, so too have I been following this physical body till today.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)