श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.307.22 
यदा तु गुणजालं तत् प्राकृतं वै जुगुप्सते।
पश्यते च परं पश्यं तदा पश्यन्न संत्यजेत्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जब वह स्वाभाविक गुण को घृणित समझकर उससे विमुख हो जाता है, तब उसे परब्रह्म का दर्शन हो जाता है और उसे देखकर भी वह उसे त्यागता नहीं, अर्थात् उससे अलग नहीं होता ॥22॥
 
When he considers the natural quality to be disgusting and turns away from it, then he gets the glimpse of the Supreme Being, and even after seeing Him, he does not abandon Him, that is, he does not separate from Him. ॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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