Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.307.21: राजेन्द्र! प्रकृति से संयोग के समय ऐसा प्रतीत होता है मानो उसने पुरुष तद्रूपता प्राप्त कर ली है, क्योंकि वह उससे अभिन्न प्रतीत होता है, किन्तु उस अवस्था में भी वह प्रकृति से एकाकार नहीं होता, उसकी पृथकता बनी रहती है। इस प्रकार पुरुष प्रकृति से एकाकार भी प्रतीत होता है और पृथक भी। 21॥ | mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्गारका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
राजेन्द्र! प्रकृति से संयोग के समय ऐसा प्रतीत होता है मानो उसने पुरुष तद्रूपता प्राप्त कर ली है, क्योंकि वह उससे अभिन्न प्रतीत होता है, किन्तु उस अवस्था में भी वह प्रकृति से एकाकार नहीं होता, उसकी पृथकता बनी रहती है। इस प्रकार पुरुष प्रकृति से एकाकार भी प्रतीत होता है और पृथक भी। 21॥
Rajendra! At the time of union with nature, it seems as if it has attained the Purusha Tadrupta because it appears to be inseparable from it, but even in that state it does not mix with nature, its separateness remains. In this way man appears united with nature as well as separate. 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥