श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.307.20 
तदा विशुद्धो भवति प्रकृते: परिवर्जनात्।
अन्योऽहमन्येयमिति यदा बुध्यति बुद्धिमान्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जब ज्ञानी पुरुष अपने को प्राकृतिक जगत् से भिन्न जान लेता है, तब वह प्राकृतिक जगत् से रहित होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है ॥20॥
 
In this way, when a wise man realises that he is different from the natural world and that he becomes devoid of the natural world and remains in his pure form. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)