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mahabharat 12.307.2: ऋषियों ने सृष्टि और प्रलय रूपी धर्म के कार्य सहित अव्यक्त को अविद्या कहा है और चौबीस तत्वों से परे जो पच्चीसवाँ तत्व परमात्मा है, जो सृष्टि और प्रलय से रहित है, उसे विद्या कहा है॥2॥   |   mahabharat अध्याय 12.307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.307.2 
अविद्यामाहुरव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मि वै।
सर्गप्रलयनिर्मुक्तां विद्यां वै पञ्चविंशक:॥ २॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों ने सृष्टि और प्रलय रूपी धर्म के कार्य सहित अव्यक्त को अविद्या कहा है और चौबीस तत्वों से परे जो पच्चीसवाँ तत्व परमात्मा है, जो सृष्टि और प्रलय से रहित है, उसे विद्या कहा है॥2॥
 
The sages have called the unmanifested along with the work of religion in the form of creation and annihilation as Avidya and beyond the twenty-four elements, the twenty-fifth element which is the Supreme Soul, which is free from creation and annihilation, is called Vidya. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)