श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.307.19 
क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवतीमथ।
प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथाऽऽत्मन:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जब यह मनुष्य क्षर हो जाता है अर्थात् भगवान् में लीन हो जाता है, उस समय उसे प्रकृति का वास्तविक गुण और अपना अगुण समझ में आ जाता है ॥19॥
 
When this man becomes Kshar, that is, absorbed in God, at that time he understands the true quality of nature and his own non-quality. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)