श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.307.18 
एवमेव च क्षेत्रज्ञ: क्षेत्रज्ञानपरिक्षये।
प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जब क्षेत्रका ज्ञान नहीं होता, अर्थात् जब किसी पुरुषको प्रकृतिका ज्ञान नहीं होता, तब वह स्वभावसे ही निर्गुण (गुणरहित) होता है - ऐसा हमने सुना है ॥18॥
 
In this way, when there is no knowledge of the field, i.e. when a person does not have knowledge of the nature, then he is by nature nirguna (without attributes) - we have heard this. ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)