श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 307: विद्या-अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्‍गारका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.307.17 
तदा क्षरत्वं प्रकृतिर्गच्छते गुणसंश्रिता।
निर्गुणत्वं च वैदेह गुणेष्वप्रतिवर्तनात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
विदेहराज! उस समय त्रिगुणात्मक प्रकृति का नाश हो जाता है और पुरुष भी गुणों में न लगे रहने के कारण निर्गुण (गुणों से परे) हो जाता है॥17॥
 
Videraj! At that time, the threefold nature gets destroyed and the man also becomes nirguna (beyond the qualities) due to not being engaged in the qualities. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)